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ज़फ़र मुरादाबादी

1951 | दिल्ली, भारत

ज़फ़र मुरादाबादी

ग़ज़ल 10

शेर 7

मिरी उम्मीद का सूरज कि तेरी आस का चाँद

दिए तमाम ही रुख़ पर हवा के रक्खे थे

बढ़े कुछ और किसी इल्तिजा से कम हुए

मिरे हरीफ़ तुम्हारी दुआ से कम हुए

ख़ुश-गुमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ

ज़िंदगी तुझ से तअल्लुक़ खोखला साबित हुआ

यूँही किसी की कोई बंदगी नहीं करता

बुतों के चेहरों पे तेवर ख़ुदा के रक्खे थे

कारवाँ से जो भी बिछड़ा गर्द-ए-सहरा हो गया

टूट कर पत्ते कब अपनी शाख़ पर वापस हुए

पुस्तकें 7

Aaina-e-Fan-o-Shakhsiyat Mein Waqar Manvi

 

2010

अदबी क़लमकार

 

2008

Adabi Shakhsiyat

 

2007

अश्क लहजे

 

2009

Main Hun Shair

 

2014

Waqar-e-Ghazal

 

2012

 

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