ग़ज़ल 1

 

शेर 2

रौशनी में तिरी रफ़्तार से करता हूँ सफ़र

ज़िंदगी मुझ से कहीं तेज़ चलने लग जाए

ऐसे तय्यार हुआ बैठा हूँ

जैसे सच-मुच ही कहीं जाना है

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