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उर्दू के लोकप्रिय मज़ाहिया उद्धरण

उर्दू में लिखा गया हास्य

साहित्य असाधारण प्रकृति का है। इसी की एक झलक आपको दिखने के लिए हमने उर्दू में लिखे गए हास्य-लेखन से छोटे-छोटे कथनों व उद्धरणों का चयन किया है जो यहाँ आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इन मज़ाहिया उद्धरणों को पढ़िए और ज़िदगी को पुर लुत्फ़ बनाइए।

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लाहौर की बाअ्ज़ गलियाँ इतनी तंग हैं कि अगर एक तरफ़ से औरत रही हो और दूसरी तरफ़ से मर्द तो दरमियान में सिर्फ़ निकाह की गुंजाइश बचती है।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

मर्द की आँख और औरत की ज़बान का दम सबसे आख़िर में निकलता है।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

मूंगफली और आवारगी में ख़राबी यह है कि आदमी एक दफ़ा' शुरू कर दे तो समझ में नहीं आता, ख़त्म कैसे करे।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

मुसलमान हमेशा एक अमली क़ौम रहे हैं। वो किसी ऐसे जानवर को मुहब्बत से नहीं पालते जिसे ज़िब्ह कर के खा ना सकें।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

जो मुल़्क जितना ग़ुर्बत-ज़दा होगा उतना ही आलू और मज़हब का चलन ज़्यादा होगा।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

मर्द इश्क़-ओ-आशिक़ी सिर्फ़ एक मर्तबा करता है, दूसरी मर्तबा अय्याशी और उसके बाद निरी अय्याशी।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

किताबों की दुनिया मुर्दों और ज़िंदों दोनों के बीच की दुनिया है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

गाली, गिन्ती, सरगोशी और गंदा लतीफ़ा तो सिर्फ़ अपनी मादरी ज़बान में ही मज़ा देता है।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

दुश्मनों के हस्ब-ए-अदावत तीन दर्जे हैं: दुश्मन, दुश्मन-ए-जानी, और रिश्तेदार।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

कभी-कभी कोई इंतिहाई घटिया आदमी आपको इंतिहाई बढ़िया मश्वरा दे जाता है। मगर आह! कि आप मश्वरे की तरफ़ कम देखते हैं, घटिया आदमी की तरफ़ ज़्यादा।

फ़िक्र तौंसवी

सच ये है कि काहिली में जो मज़ा है वो काहिल ही जानते हैं। भाग दौड़ करने वाले और सुबह-सुबह उठने वाले और वरज़िश-‏पसंद इस मज़े को क्या जानें।

इब्न-ए-इंशा

जितना वक़्त और रुपया बच्चों को “मुस्लमानों के साईंस पर एहसानात” रटाने में सर्फ़ किया जाता है, दसवाँ हिस्सा ‏भी बच्चों को साईंस पढ़ाने में सर्फ़ किया जाए तो मुसलमानों पर बड़ा एहसान होगा।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

अंग्रेज़ी फिल्मों में लोग यूँ प्यार करते हैं जैसे तुख़्मी आम चूस रहे हैं।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

कहते हैं सिगरेट के दूसरे सिरे पर जो राख होती है दर-अस्ल वो पीने वाले की होती है।

मोहम्मद यूनुस बट

कुँवारी लड़की उस वक़्त तक अपना बर्थ-डे मनाती रहती है, जब तक वह हनीमून मनाने के काबिल नहीं हो जाती।

फ़िक्र तौंसवी

बढ़ियाँ सिगरेट पीते ही हर शख़्स को मुआ'फ़ कर देने को जी चाहता है... ख़्वाह वो रिश्तेदार ही क्यों हो।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

औसत का मतलब भी लोग ग़लत समझते हैं। हम भी ग़लत समझते थे। जापान में सुना था कि हर दूसरे आदमी ‏के पास कार है। हमने टोकियो में पहले आदमी की बहुत तलाश की लेकिन हमेशा दूसरा ही आदमी मिला। मा'लूम हुआ पहले ‏आदमी दूर-दराज़ के देहात में रहते हैं।

इब्न-ए-इंशा

एक ख़ातून ने होने वाले ख़ाविंद से कहा, “शादी के बा'द मैं आपके दुख बाँटा करूँगी। उसने कहा, “मगर मुझे‏ तो कोई दुख नहीं।” तो वो बोली, “मैं शादी के बा'द की बात कर रही हूँ।” शायद इसीलिए हर सियासत-दाँ यही ‏कहता है अगर मैं जीत गया तो आपके दुख बाँटूंगा।

मोहम्मद यूनुस बट

‏सच तो ये है कि हुकूमतों के अ'लावा कोई भी अपनी मौजूदा तरक़्क़ी से मुत्मइन नहीं होता।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

औरतों की आधी उ'म्र तो अपनी उ'म्र कम करने में गुज़र जाती है। एक मुलाज़िमत के इंटरव्यू के दौरान इंटरव्यू लेने वाले ने ‏पूछा, “मोहतरमा आपकी उ'म्र?” जवाब मिला, “19 साल कुछ महीने” पूछा, “कितने महीने?” जवाब मिला, “छियानवे‏ महीने!”‏

मोहम्मद यूनुस बट

हर माक़ूल आदमी का बीवी से झगड़ा होता है क्योंकि मर्द औरत का रिश्ता ही झगड़े का है।‏

राजिंदर सिंह बेदी

दर-अस्ल शादी एक लफ़्ज़ नहीं पूरा फ़िक़्रा है।

शफ़ीक़ुर्रहमान

किसी दाना या नादान का मक़ूला है कि झूट के तीन दर्जे हैं। झूट, सफ़ेद झूट और आ'दाद-ओ-शुमार।

इब्न-ए-इंशा

गधे और इंसान में ये फ़र्क़ है कि गधा सिगरेट नहीं पीता और झूट नहीं बोल सकता।

मोहम्मद यूनुस बट

सिगरेट है क्या? काग़ज़ की एक नली जिसके एक सिरे पर शोला और दूसरे पर एक नादान होता है। कहते हैं सिगरेट ‏के दूसरे सिरे पर जो राख होती है दर-अस्ल वो पीने वाले की होती है। ऐश ट्रे वो जगह है जहाँ आप ये राख ‏उस वक़्त डालते हैं जब आपके पास फ़र्श हो। वैसे तो सिगरेट पीने वाले के लिए पूरी दुनिया ऐश ट्रे ही होती है ‏बल्कि होते-होते ये हाल हो जाता है कि वो सिगरेट मुँह में रखकर समझता है ऐश ट्रे में रखा है। रुडयार्ड‏ किपलिंग कहता है कि एक औ'रत सिर्फ़ एक औ'रत होती है जबकि अच्छा सिगार बस धुआँ होता है। दुनिया का सबसे ‏महंगा सिगरेट आपका पहला सिगरेट होता है, बा'द में सब सस्ता हो जाता है यहाँ तक कि पीने वाला भी।

मोहम्मद यूनुस बट

जानते हो औ'रत की उ'म्र के छः हिस्से होते हैं: बच्ची, लड़की, नौ-उ'म्र ख़ातून, फिर नौ-उ'म्र ख़ातून, फिर नौ-उ'म्र ख़ातून,‏ फिर नौ-उ'म्र ख़ातून।

शफ़ीक़ुर्रहमान

ख़ुदा ने गुनाह को पहले पैदा नहीं किया। इंसान को पहले पैदा कर दिया। यह सोच कर कि अब ये ख़ुद-ब-ख़ुद गुनाह पैदा करेगा।

फ़िक्र तौंसवी

मर्द की उ'म्र वो होती है जो वो महसूस करता है और औ'रत की वो जो आप महसूस करते हैं।

मोहम्मद यूनुस बट

चार आदमियों की सोहबत अदीब के तख़्लीक़ी काम में खंडत डालती है। लड़ाका बीवी, बातूनी इंटेलेक्चुअल, लायक़ मुअल्लिम और अदब की सरपरस्ती करने वाला अफ़सर।

इन्तिज़ार हुसैन

दुनिया में ये बहस हमेशा से चली रही है कि अंडा पहले या मुर्ग़ी। कुछ लोग कहते हैं अंडा। कुछ का कहना है मुर्ग़ी।‏ एक को हम मुर्ग़ी स्कूल या फ़िर्क़ा-ए-मुर्गिया कह सकते हैं। दूसरे को अंडा स्कूल। हमें अंडा स्कूल से मुंसलिक‏ समझना चाहिए। मिल्लत-ए-बैज़ा का एक फ़र्द जानना चाहिए। हमारा अ'क़ीदा इस बात में है कि अगर आदमी थानेदार या मौलवी‏ या'नी फ़क़ीह-ए-शहर हो तो उसके लिए मुर्ग़ी पहले और ऐसा ग़रीब-ए-शहर हो तो उसके लिए अंडा पहले और ग़रीब-ए-शहर से भी गया ‏गुज़रा हो तो उसकी दस्तरस मुर्ग़ी तक हो सकती है अंडा उसकी गिरफ़्त में सकता है। उसे अपनी ज़ात और इसकी‏ बक़ा को इन चीज़ों से पहले जानना चाहिए।

इब्न-ए-इंशा

जितनी देर आप दूसरों से इंतिज़ार कराते हैं, दर-अस्ल उतनी देर आप उनसे अपना ज़िक्र करवाते हैं।

मोहम्मद यूनुस बट

अगर ये बात ठीक है कि मेहमान का दर्जा भगवान का है तो मैं बड़ी नम्रता से आपके सामने हाथ जोड़ कर कहूँगा कि ‎मुझे ‎‏भगवान से भी नफ़रत है।‏

राजिंदर सिंह बेदी

औरत का हुस्न सिर्फ उस वक़्त तक बर-क़रार रहता है, जब तक उसके सना-ख़्वाँ मौजूद हो।

फ़िक्र तौंसवी

उस औरत की किसी भी बात का ए'तिबार करो, जो ख़ुदा की क़सम खा कर अपनी उम्र सही बता देती है।

फ़िक्र तौंसवी

बटन लगाने से ज़्यादा मुश्किल काम बटन तोड़ना है। और ये एक तरह से धोबियों का कारोबारी राज़ है। हमने घर पर कपड़े‏ धुलवा कर और पटख़वा कर देखा लेकिन कभी इस में कामयाबी हुई जब कि हमारा धोबी उन्ही पैसों में जो हम‏ धुलाई के देते हैं, पूरे बटन भी साफ़ कर लाता है। एक और आसानी जो उसने अपने सरपरस्तों के लिए फ़राहम की है,‏ वो ये है कि अपने छोटे बेटे को अपनी लांडरी के एक हिस्से में बटनों की दुकान खुलवा दी है जहाँ हर तरह के बटन‏ बा-रिआयत निर्ख़ों पर दस्तयाब हैं।

इब्न-ए-इंशा

ये मर्द ऐवरेस्ट पर चढ़ जाएँ, समंदर की तह तक पहुँच जाएँ, ख़्वाह कैसा ही ना-मुमकिन काम क्यों कर लें, मगर‏ औ'रत को कभी नहीं समझ सकते। बाज़-औक़ात ऐसी अहमक़ाना हरकत कर बैठते हैं कि अच्छी भली मोहब्बत नफ़रत‏ में तबदील हो जाती है, और फिर औ'रत का दिल... एक ठेस लगी और बस गया। जानते हैं कि हसद और रश्क तो औ'रत ‏की सरिशत में है। अपनी तरफ़ से बड़े चालाक बनते हैं मगर मर्द के दिल को औ'रत एक ही नज़र में भाँप जाती ‏है।

शफ़ीक़ुर्रहमान

आदमी अगर क़ब्ल-अज़-वक़्त मर सके तो बीमे का मक़सद ही फ़ौत हो जाता है।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

अहम आदमी उस वक़्त आता है जब सब चुके होते हैं और इसकी आमद का इंतिज़ार कर रहे होते हैं। देर से आना दर-अस्ल‏ आम से ख़ास होने का अ'मल है।

मोहम्मद यूनुस बट

इसकी उदासी भी एक उदासी ही होती है। पूछो, “मुहब्बत कैसे शुरू होती है?” तो कहेगी, “मुहब्बत से ‏शुरू' होती है।” किसी ने कहा कि मियाँ बीवी के झगड़ों में सालिस बच्चे होते हैं, तो कहने लगी बिल्कुल ग़लत, मियाँ‏-बीवी के झगड़ों में सालिस रात होती है। कहती है, “मर्द और औ'रत की सोच एक जैसी होती है, औ'रत मर्द‏ से सोना माँगती है और मर्द भी बदले में सोना ही चाहता है।”‏

मोहम्मद यूनुस बट

लेक्चरार की ता'रीफ़ ये है कि वो शख़्स जो दूसरों की नींद में बोलता है।‏

मोहम्मद यूनुस बट

इंसानी उ'म्र की सिर्फ़ तीन ही सूरतें हैं। जो आनी, जवानी और जो आई।

मोहम्मद यूनुस बट

बीवी आपसे कितनी नफ़रत करती है, इसका उस वक़्त तक पता नहीं चलता, जब तक मेहमान घर में आए। जैसे ‎आपको‏‎ भूलने के सिवा कुछ नहीं आता, ऐसे ही बीवी याद रखने के सिवा और कुछ नहीं जानती। जाने कब का बुग़्ज़ ‎आपके ख़िलाफ़‏‎ सीने में लिए बैठी है जो मेहमान के आते ही पंडोरा बॉक्स की तरह आपके सिर पर उलट देती है।‏

राजिंदर सिंह बेदी

जब कोई चीज़ नायाब या महंगी हो जाती है तो उसका बदल निकल ही आता है जैसे भैंस का ने’अम-उल-बदल मूंगफली। आप‏को तो घी से मतलब है। कहीं से भी आए। अब वो मरहला गया है कि हमारे हाँ बकरे और दुंबे की सनअ'त भी‏ क़ाएम हो। आप बाज़ार में गए और दुकानदार ने डिब्बा खोला कि जनाब ये लीजिए बकरा और ये लीजिए पंप से हवा इस में ख़ुद‏ भर लीजिए। खाल इस बकरे की कैरेलीन की है। और अंदर कमानियाँ स्टेनलेस स्टील की। मग़्ज़ में फ़ोम रबड़ है। वाश‏ ऐंड वियर होने की गारंटी है। बाहर सेहन में बारिश या ओस में भी खड़ा कर दीजिए तो कुछ बिगड़ेगा। हवा निकाल कर‏ रेफ्रीजरेटर में भी रखा जा सकता है। आजकल क़ुर्बानी वाले यही ले जाते हैं।

इब्न-ए-इंशा

एक ज़माना था कि हम क़ुतुब बने अपने घर में बैठे रहते थे और हुआ कि हम ख़ुद गर्दिश में रहने हमारा सितारा गर्दिश में रहा करता था। फिर ख़ुदा का करना ‏ऐसा हुआ कि हम ख़ुद गर्दिश में रहने लगे और हमारे सितारे ने कराची में बैठे-बैठे आब-ओ-ताब से चमकना शुरू‏’ कर दिया। फिर अख़बार जंग में “आज का शाइर” के उ'नवान से हमारी तस्वीर और हालात छपे। चूँकि हालात हमारे कम‏ थे लिहाज़ा उन लोगों को तस्वीर बड़ी करा के छापनी पड़ी और क़ुबूल-सूरत, सलीक़ा-शिआ'र, पाबंद-ए-सौम-ओ-सलात औलादों के‏ वालिदैन ने हमारी नौकरी, तनख़्वाह और चाल-चलन के मुतअ'ल्लिक़ मा'लूमात जमा' करनी शुरू कर दें। यूँ ऐ'ब-बीनों और ‏नुक्ता-चीनियों से भी दुनिया ख़ाली नहीं। किसी ने कहा ये शाइर तो हैं लेकिन आज के नहीं। कोई बे-दर्द बोला, ये आज के तो‏ हैं लेकिन शाइर नहीं। हम बद-दिल हो कर अपने अ'ज़ीज़ दोस्त जमीलउद्दीन आली के पास गए। उन्होंने हमारी ढारस ‏बँधाई और कहा दिल मैला मत करो। ये दोनों फ़रीक़ ग़लती पर हैं। हम तो तुम्हें शाइर जानते हैं आज का मानते हैं।‏ हमने कसमसाकर कहा, “ये आप क्या फ़र्मा रहे हैं?” बोले, “मैं झूट नहीं कहता और ये राय मेरी थोड़ी है सभी‏ समझदार लोगों की है।”

इब्न-ए-इंशा

‏कहते हैं पहले आदमी सिगरेट को पीता है, फिर सिगरेट सिगरेट को पीता है और आख़िर में सिगरेट आदमी को पीता है। लेकिन‏ फिर भी ये हक़ीक़त है कि इतने लोग सिगरेट से नहीं मरते जितने सिगरेट पर मरते हैं। अंग्रेज़ी में इसे स्मोकिंग‏ कहते हैं लोगों को शायद स्मोकिंग पसंद ही इसलिए है कि इसमें ”किंग” आता है लेकिन इस दौर में ”किंग” कहीं ‏के नहीं रहे। सो लगता है अ'न-क़रीब धुआँ देने वाली गाड़ियों की तरह धुआँ देने वाले अफ़राद का भी चौराहों में चालान‏ हुआ करेगा।

मोहम्मद यूनुस बट

हमें दुश्मन से झगड़ने के बाद ही वो गाली याद आती है, जो दुश्मन की गाली से ज़ियादा करारी और तीखी थी।

फ़िक्र तौंसवी

अस्ल में हमारे यहाँ मौलवियों और अदीबों का ज़हनी इर्तिक़ा (बौद्धिक विकास) एक ही ख़ुतूत पर हुआ है।

इन्तिज़ार हुसैन

हम वा'दा करते हैं, तो किसी उम्मीद पर। लेकिन जब वा'दा पूरा करने लगते हैं, तो किसी डर के मारे।

फ़िक्र तौंसवी

मेरा ज़ाती नज़रिया तो यही है कि एक तंदुरुस्त इंसान को मोहब्बत कभी नहीं करनी चाहिए। आख़िर कोई तुक भी है इस‏में? ख़्वाह-मख़्वाह किसी के मुतअ'ल्लिक़ सोचते रहो, ख़्वाह वो तुम्हें जानता ही हो। भला किस फार्मूले से साबित होता है ‏कि जिसे तुम चाहो वो भी तुम्हें चाहे। मियाँ ये सब मन-गढ़त क़िस्से हैं। अगर जान-बूझ कर ख़ब्ती बनना चाहते‏ हो तो बिस्मिल्लाह किए जाओ मुहब्बत। हमारी राय तो यही है कि सब्र कर लो।

शफ़ीक़ुर्रहमान

अगर कोई अदाकारा को लिबास के बग़ैर देख कर ख़ुश ना हो तो यक़ीन कर लें, वो जेब-कतरा है।

मोहम्मद यूनुस बट
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