मोहम्मद हसन असकरी के लेख
उर्दू अदब की रिवायत क्या है?
ज़ाहिरी हालात तो यही बता रहे हैं कि अब दुनिया से शेर-ओ-अदब (काव्य और साहित्य) का चल-चलाव है। आमतौर पर लोग इसकी वजह यह बताते रहते हैं कि साइंस और औद्योगीकरण के मुक़ाबले में अदब का ठहरना मुश्किल है। लेकिन आजकल हम यह तमाशा भी देख रहे हैं कि यूरोप और अमेरिका
रिवायत क्या है?
बाहर से मकान की बनावट यूक्लिडियन, ड्योढ़ी रोकोको (Rococo) अंदाज़ की, दीवानख़ाने में महारानी ऐन के ज़माने का फ़र्नीचर, बैठक में नई इतालवी कुर्सियां, खाने के कमरे में बिजली से बर्तन धोने के इंतज़ाम के साथ-साथ जापानी तर्ज़ का दस्तरख़्वान, सोने के कमरे में
इंसान और आदमी
इस लेख के बारे में एक अहम बात यह है कि इस पर कई हफ़्ते लगे हैं। यह वक़्त मैंने लिखने में नहीं लगाया, सोचने में भी नहीं। अगर मुझमें किसी वैचारिक विषय पर इतनी देर लगातार सोचने की सलाहियत होती, तो भी यह बात संदिग्ध रहती कि इस क़िस्म की सलाहियत किसी कहानीकार
फ़सादात और हमारा अदब
47 के दंगे मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ा क़ौमी हादसा हैं, जिसके असर हम में से हर आदमी की ज़िंदगी पर पड़े हैं, किसी की ज़िंदगी पर कम किसी की ज़िंदगी पर ज़्यादा मगर पड़े ज़रूर हैं। शायद ऐसी घटनाएँ दुनिया के इतिहास में कभी नहीं हुईं। चूँकि बात इतने क़रीब
मार्कसियत और अदबी मंसूबा-बंदी
इंसानी इतिहास और इंसानी चिंतन के इतिहास में मार्क्सवाद की जो हैसियत और अहमियत है, वह इतनी मानी हुई है कि बार-बार इसका ज़िक्र करना भी वक़्त बर्बाद करना है। अगर पक्षपात की रुकावटें न आएं तो यह बात मान लेने में किसी को ऐतराज़ नहीं होगा कि मार्क्सवाद ने
अदब और इंक़िलाब
अदब (साहित्य) और इंक़लाब (क्रांति) के बीच क्या रिश्ता है? अदब को इंक़लाब के काम में मददगार होना चाहिए, या नहीं? अगर होना चाहिए तो किस हद तक? ये सब सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब सोचने से पहले हमें इंक़लाब का मतलब तय करना चाहिए क्योंकि अमूमन जो लोग इंक़लाब-पसंद
मुहावरों का मसअला
कमबख्त अदब में जहाँ और बीस मुसीबतें हैं, वहाँ एक झगड़ा यह भी है कि इसके एक तत्व को बाकी तत्वों से अलग करके समझना चाहें तो बात आधी-अधूरी रह जाती है। यहाँ वह डॉक्टरों वाली बात नहीं चलती कि कोई कान की बीमारियों का विशेषज्ञ है तो कोई नाक की बीमारियों का,
फ़न बराए फ़न
कुछ लोगों को मुझसे शिकायत है कि यह अच्छे-खासे गंभीर लेख को आम लोगों की ज़बान में पेश करके हल्का बना देता है। ख़ुदा जाने इन बुज़ुर्गों को मेरे एक इससे भी ज़्यादा चिंताजनक और बुनियादी हल्केपन के शौक़ का एहसास अभी तक क्यों नहीं हुआ। बड़े-बड़े नज़रियों और
तारीख़ी शऊर
साहित्यिक ठहराव के कारण राजनीतिक भी हो सकते हैं, और आर्थिक भी। मगर अन्य बातों के साथ-साथ एक बहुत बड़ी वजह यह भी है कि विचारकों से ज़माना जो मांगें कर रहा है, वे उनके लिए बहुत अप्रत्याशित हैं, इसलिए वे असमंजस में पड़ गए हैं। हर तरफ़ से यह आवाज़ आ रही है कि
मंटो फ़सादात पर
पिछले दस साल में नए साहित्य के आंदोलन ने उर्दू कथा-साहित्य में बहुमूल्य इज़ाफ़ा किया है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ज़्यादातर नए अफ़सानों की प्रेरणा रचना की अंदरूनी लगन नहीं थी, बल्कि बाहरी हालात और घटनाएँ थीं, चाहे उनका संबंध ख़ुद
अदब-ओ-फ़न में फ़ोह्श का मसअला
पिछले महीने अपनी बातों के सिलसिले में फ़िराक़ साहब ने कुछ ऐसे शेर लिए थे जिन्हें आम तौर पर अश्लील (फ़हश) समझा जाता है और बताया था कि वे अश्लील क्यों नहीं हैं। हर बहस में और ख़ासकर इस अश्लील लेखन की बहस में, पक्के नियम बनाने और निरपेक्ष सिद्धांतों पर
इस्ति'आरे का ख़ौफ़
उन्नीसवीं सदी में जिन लोगों ने हमारे साहित्य में पश्चिमी अनुकरण का आंदोलन शुरू किया, उन्होंने ख़ुद कभी पश्चिमी साहित्य नहीं पढ़ा था। दूसरों से अनुवाद करा के सुना तो साहित्य से नहीं, बल्कि कुछ विचारों से परिचय हुआ। चूँकि विजेता क़ौम का रोब दिल पर जमा हुआ
मीर और नई ग़ज़ल-1
यह बात अब साफ़ होती जा रही है कि हमारी ग़ज़ल पर ग़ालिब के बजाय मीर का असर बढ़ रहा है। इसकी वजह महज़ बदलाव की चाह नहीं है। अब हमारे ग़ज़ल कहने वाले नई ज़ेहनी और रूहानी ज़रूरतें महसूस कर रहे हैं जो ग़ालिब की शायरी से पूरी नहीं होतीं। अब उनके सामने ऐसे
हैअत या नैरंग-ए-नज़र?
"रहस्यमय आदमी! ज़रा यह तो बता कि सबसे ज़्यादा किससे मोहब्बत करता है? अपने बाप से, माँ से, बहन से या भाई से?" "मेरा न तो कोई बाप है न माँ, न बहन, न भाई।" "अपने दोस्तों से?" "यह तो तुमने ऐसा शब्द इस्तेमाल किया है जिसका मैं आज तक मतलब नहीं समझा।" "अपने