aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "union"
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है
वो बिगड़ना वस्ल की रात का वो न मानना किसी बात कावो नहीं नहीं की हर आन अदा तुम्हें याद हो कि न याद हो
बे-क़रारी सी बे-क़रारी हैवस्ल है और फ़िराक़ तारी है
कहनी है मुझ को एक बात आप से या'नी आप सेआप के शहर-ए-वस्ल में लज़्ज़त-ए-हिज्र भी गई
ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जातेआई शब-ए-हिज्राँ की तमन्ना मिरे आगे
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सहीनहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही
शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताहसखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ
न आए राह पे वो इज्ज़ बे-शुमार कियाशब-ए-विसाल भी मैं ने तो इंतिज़ार किया
हँसा हँसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार कियातसल्लियाँ मुझे दे दे के बे-क़रार किया
हमारे सीने में जो रह गई थी आतिश-ए-हिज्रशब-ए-विसाल भी उस को न हम-कनार किया
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