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तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
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ग़ज़ल
दूद-ए-आह-ए-दिल-ए-सोज़ाँ है 'मुबारक' अपना
जो धुआँ शम्अ से बलीन-ए-मज़ार उठता है
मुबारक अज़ीमाबादी
शेर
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
साहिर लुधियानवी
शेर
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं










