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नज़्म
जुगनू
ये शाम डूबती जाती है छुपती जाती है
हिजाब-ए-वक़्त सिरे से है बेहिस-ओ-हरकत
फ़िराक़ गोरखपुरी
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शेर
न हो एहसास तो सारा जहाँ है बे-हिस-ओ-मुर्दा
गुदाज़-ए-दिल हो तो दुखती रगें मिलती हैं पत्थर में
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
कभी मैं बेहिस-ओ-हरकत पड़ा रहता हूँ पहरों तक
कभी मैं ज़िंदगी के साज़ पर नग़्मे सुनाता हूँ

