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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुझ से पहले
शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में
और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है
सलीम कौसर
नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आवारा
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
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dost
दोस्त دوسْت
वह व्यक्ति जिसका शुभचिंतन और मोहब्बत विश्वसनीय हो या जिससे सच्ची मंगलकामना और प्यार किया जाए, जिसके साथ मेलजोल, मेल-मिलाप, मुलाक़ात हो (दुश्मन का विपरीत)
hayaa-dost
हया-दोस्त حَیا دوسْت
رک : حیادار.
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ग़ज़ल
खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही
कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
जौन एलिया
ग़ज़ल
मैं तो समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले
तू ने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी

