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ग़ज़ल
किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा
जो आप्-ही मर रहा हो उस को गर मारा तो क्या मारा
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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नज़्म
चाँद तारों का बन
उन की साँसों में अफ़ई की फुन्कार थी
उन के सीने में नफ़रत का काला धुआँ
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
हज़र करो मिरे तन से
मगर वो ज़हर-ए-हलाहल भरा है नस नस में
जिसे भी छेदो हर इक बूँद क़हर-ए-अफ़ई है










