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ग़ज़ल
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुझ से पहले
ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
अहमद फ़राज़
नज़्म
कभी कभी
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले






