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शेर
हर इक फ़िक़रे पे है झिड़की तो है हर बात पर गाली
तुम ऐसे ख़ूबसूरत हो के इतने बद-ज़बाँ क्यूँ हो
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
साक्षात्कार
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
शेर
चार बोसे तो दिया कीजिए तनख़्वाह मुझे
एक बोसे पे मिरा ख़ाक गुज़ारा होगा
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
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शेर
जो तेरे गुनह बख़्शेगा वाइ'ज़ वो मिरे भी
क्या तेरा ख़ुदा और है बंदे का ख़ुदा और
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
ये हिन्दोस्तान है याँ पर्बतों का रोज़ मेला है
ख़ुदा जाने वो बुत ऐ 'मेहर' देबी है कि दुर्गा है
हातिम अली मेहर
शेर
मलक-उल-मौत मोअज़्ज़िन है मिरा वस्ल की रात
दम निकल जाता है जब वक़्त-ए-अज़ाँ आता है
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
शेर
हिदायत शैख़ करते थे बहुत बहर-ए-नमाज़ अक्सर
जो पढ़ना भी पड़ी तो हम ने टाली बे-वज़ू बरसों
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
क़ातिल के कूचे में हमा-तन जाऊँ बन के पाँव
मर कर ही ताकि सो तो ज़रा पाऊँ तन के पावँ
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
कहें क्या कि क्या क्या सितम देखते हैं
लिखा है जो क़िस्मत में हम देखते हैं
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
ईजाद ग़म हुआ दिल-ए-मुज़्तर के वास्ते
पैदा जुनूँ हुआ है मिरे सर के वास्ते
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
शेर
आँख अपनी तिरी अबरू पे जमी रहती है
रोज़ इस बैत पे हम साद किया करते हैं
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
चढ़ रही थी फ़ित्ना-ए-इमरोज़ की देबी पे भेंट
शाहिद-ए-फ़र्दा का चेहरा ना-गहाँ रौशन हुआ


