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ग़ज़ल
जौन एलिया
ग़ज़ल
न बायज़ीद न शिबली न अब जुनैद कोई
न अब ओ सोज़ न आहें न हाव-हू ख़ाने
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
'ज़फ़र' वो ज़ाहिद-ए-बेदर्द की हू-हक़ से बेहतर है
करे गर रिंद दर्द-ए-दिल से हाव-हु-ए-मस्ताना
बहादुर शाह ज़फ़र
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नज़्म
इस्राफ़ील की मौत
थी इसी के दम से दरवेशों की सारी हाव-हू
अहल-ए-दिल की अहल-ए-दिल से गुफ़्तुगू
नून मीम राशिद
कहानी
"Little Sir Echo how do you do Hell hello wont you come over and dance with me."...
क़ुर्रतुलऐन हैदर
लेख
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
किरन सूरज की कहती है फिर आएगी शब-ए-हिज्राँ
सहर होती है 'अख़्तर' सो रहो ये हाव-हू क्या है
अख़्तर सईद ख़ान
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
साक्षात्कार
How to come to terms with it, with all this change and discontinuity?...
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
शेर
हम इस शहर-ए-जफ़ा-पेशा से कुछ उम्मीद क्या रक्खें
यहाँ इस हाव-हू में ख़ामुशी को कौन लिक्खेगा
हिजाब अब्बासी
ग़ज़ल
ब-याद-ए-चश्म-ए-यार इक ना'रा-ए-मस्ताना ऐ साक़ी
कि हाव हू से ख़ाली है तिरा मय-ख़ाना बरसों से
