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ग़ज़ल
मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन
अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना
मेराज फ़ैज़ाबादी
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शेर
उस के बा'द अगली क़यामत क्या है किस को होश है
ज़ख़्म सहलाता था और अब दाग़ दिखलाता हूँ मैं
शाहीन अब्बास
नज़्म
ख़ाक-ए-हिंद
अगली सी ताज़गी है फूलों में और फलों में
करते हैं रक़्स अब तक ताऊस जंगलों में


