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नज़्म
इतना मालूम है!
चलते चलते कोई मानूस सी आहट पा कर
दोस्तों को भी किस उज़्र से रोका होगा
परवीन शाकिर
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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ज़िना-ज़ादे मिरी इज़्ज़त भी गुस्ताख़ाना करते हैं
कमीने शर्म भी अब मुझ से बे-शर्माना करते थे
जौन एलिया
नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
शीशों का मसीहा कोई नहीं
या शायद इन ज़र्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का











