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नज़्म
हिण्डोला
ये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एक
वो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ाल
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
विर्सा
ये सदाओं के ख़म-ओ-पेच ये रंगों की ज़बाँ
चिमनियों से ये निकलता हुआ पुर-पेच धुआँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
रग-ओ-पय में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिए क्या हो
अभी तो तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन की आज़माइश है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
ख़्वाब-ए-सराब
बंद गलियों के ख़म-ओ-पेच में चकराते रहे
अपने होने की तब-ओ-ताब में लहराते रहे
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
क़ाएदे क्या हमें मालूम नहीं उल्फ़त के
बे-कम-ओ-कास्त मगर उन को पढ़ा सकते नहीं
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
अपनी नाकाम उमीदों के ख़म-ओ-पेच में गुम
अब्र-ए-कम-आब थे हम रिज़्क़-ए-समुंदर न हुए






