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नज़्म
जो इल्म मर्दों के लिए समझा गया आब-ए-हयात
जो इल्म मर्दों के लिए समझा गया आब-ए-हयात
ठहरा तुम्हारे हक़ में वो ज़हर-ए-हलाहिल सर-बसर
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
गुनाह-ए-इश्क़ में इस बात की तस्कीन होती है
हुआ हो जुर्म गहरा तो सज़ा संगीन होती है