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नज़्म
राखी
झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी
तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
शब-बरात
कहते हुए ये दिल में अहा-हा री शब-बरात
छोड़े है लट्टू तोंबड़ी हर-दम बना के जो
नज़ीर अकबराबादी
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तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
ये बूढ़े गो कि अपने मुँह से शैख़ी में नहीं कहते
भरा है आह पर इन सब के दिल में ग़म जवानी का












