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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
जिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम हो
नहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम हो
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अहमद सलमान
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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा है
ये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा है
जौन एलिया
नज़्म
ख़ुदा का सवाल
तू मेराज-ए-फ़न तू ही फ़न का सिंघार
मुसव्विर हूँ मैं तू मिरा शाहकार
अबरार अहमद काशिफ़
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जावेद के नाम
मैं शाख़-ए-ताक हूँ मेरी ग़ज़ल है मेरा समर
मिरे समर से मय-ए-लाला-फ़ाम पैदा कर
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
इश्क़ की हालत कुछ भी नहीं थी बात बढ़ाने का फ़न था
लम्हे ला-फ़ानी ठहरे थे क़तरों की तुग़्यानी थी
जौन एलिया
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
परे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ की
सितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारो




