aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ".fou"
सलीम फ़ौज़
born.1965
शायर
हनीफ़ फ़ौक़
1926 - 2009
मोहम्मदुद्दीन फ़ौक़
1877 - 1945
लेखक
सेनट्रल कौंसिल फॉर रिसर्च इन यूनानी मेडीसिन, नई दिल्ली
पर्काशक
फ़ौक़ लुधियानवी
डॉ. फ़ौक़ करीमी
राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद्, नई दिल्ली
मुहीउद्दीन फ़ौक़
डैनियल डेफॉ
1660 - 1731
एसोसिएशन फॉर कल्चरल फ्रेटरनिटी, लुधियाना, पंजाब
टी.डी फ़ार सायथा
मतबा फ़ौक़ काशी
फ़ाैक़ देहलवी
प्रेस फॉर पीस पब्लिकेशन
सेन्टर फार साउथ एशिया युनिवर्सिटी आफॅ़ विसडम, मेडसन
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज्दाद बेच देगीजो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है
अकबर दबे नहीं किसी सुल्ताँ की फ़ौज सेलेकिन शहीद हो गए बीवी की नौज से
हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगायही क़िस्मत हमारी है सितारो तुम तो सो जाओ
बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदनउसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे
सबसे प्रख्यात एवं प्रसिद्ध शायर. अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई साल कारावास में रहे।
रचनाकार की भावुकता एवं संवेदनशीलता या यूँ कह लीजिए कि उसकी चेतना और अपने आस-पास की दुनिया को देखने एवं एहसास करने की कल्पना-शक्ति से ही साहित्य में हँसी-ख़ुशी जैसे भावों की तरह उदासी का भी चित्रण संभव होता है । उर्दू क्लासिकी शायरी में ये उदासी परंपरागत एवं असफल प्रेम के कारण नज़र आती है । अस्ल में रचनाकार अपनी रचना में दुनिया की बे-ढंगी सूरतों को व्यवस्थित करना चाहता है,लेकिन उसको सफलता नहीं मिलती । असफलता का यही एहसास साहित्य और शायरी में उदासी को जन्म देता है । यहाँ उदासी के अलग-अलग भाव को शायरी के माध्यम से आपके समक्ष पेश किया जा रहा है ।
महत्वपूर्ण प्रगतिशील शायर। उनकी कुछ ग़ज़लें ' बाज़ार ' और ' गमन ' , जैसी फिल्मों से मशहूर
भौبَھو
जन्म। पुं० = भय (डर)। अ० [हिं० भवना] हुआ। (अवधी)
पौپَو
ज्योति या प्रकाश की रेखा।
गऊگَئُو
गौ, गाय
गौگَو
अपने स्वार्थ या हित के साधन की प्रबल इच्छा। प्रयोजन। मतलब। जैसे-वह अपनी गौं को आवेगा। पद-गों का यार = मतलबी। स्वार्थी। मुहा०-गौं गांठना या निकालना = अपना मतलब निकालना। स्वार्थ साधन करना। गौं पड़ना मतलब होना।
Fauz-e-Mubeen Dar-Radd-e-Harkat-e-Zameen
अहमद रज़ा खां बरेलवी
Tareekh Aqwam-e-Kashmir
Tareekh-e-Aqwam-e-Kashmir
सबक़ आमोज़ कहानियाँ
बाल-साहित्य
Mashahir-e-Kashmir
Tareekh-e-Aqwam Poonchh
साहित्य का इतिहास
Anar Kali
ऐतिहासिक
Rahnuma-e-Kashmeer
सफ़र-नामा / यात्रा-वृतांत
Ibn Arabi
ऐंजेला जाफ़रे
Kalam-e-Fauq
काव्य संग्रह
Mukammal Tareekh-e-Kashmir
भारत का इतिहास
Mohammad Al-Deen Fauq
मोहम्मद अजमल नियाज़ी
ग़ालिब नज़र और नज़ारा
आलोचना
Urdu For HSC A.Level
शमीम हनफ़ी
Uswatur Rasool
सय्यद औलाद हैदर फ़ाैक़
अगर मैं समझूँके ये जो मोहरे हैंसिर्फ़ लकड़ी के हैं खिलौनेतो जीतना क्या है हारना क्यान ये ज़रूरीन वो अहम हैअगर ख़ुशी है न जीतने कीन हारने का ही कोई ग़म हैतो खेल क्या हैमैं सोचता हूँजो खेलना हैतो अपने दिल में यक़ीन कर लूँये मोहरे सच-मुच के बादशाह ओ वज़ीरसच-मुच के हैं प्यादेऔर इन के आगे हैदुश्मनों की वो फ़ौजरखती है जो कि मुझ को तबाह करने केसारे मंसूबेसब इरादेमगर ऐसा जो मान भी लूँतो सोचता हूँये खेल कब हैये जंग है जिस को जीतना हैये जंग है जिस में सब है जाएज़कोई ये कहता है जैसे मुझ सेये जंग भी हैये खेल भी हैये जंग है पर खिलाड़ियों कीये खेल है जंग की तरह कामैं सोचता हूँजो खेल हैइस में इस तरह का उसूल क्यूँ हैकि कोई मोहरा रहे कि जाएमगर जो है बादशाहउस पर कभी कोई आँच भी न आएवज़ीर ही को है बस इजाज़तकि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
जहाँ तन्हाइयाँ सर फोड़ के सो जाती हैंइन मकानों में अजब लोग रहा करते थे
बचपन में जो ज़बाँ से कहा था किया वो कामजिस वक़्त रन में टूट पड़े शह पे फ़ौज-ए-शामगर्दन झुका के बर्छियाँ खाया किए इमामख़ूँ में क़बा रसूल की तर हो गई तमामतेग़ें अली के लाल के शाने पे चल गईंछाती के पार नेज़ों की नोकें निकल गईं
फिर दुनिया वालों ने तुम सेये साग़र ले कर फोड़ दियाजो मय थी बहा दी मिट्टी मेंमेहमान का शहपर तोड़ दिया
कब पौ फटे कब रात कटे कौन ये जानेमत छोड़ के जाओ कि अभी रात बहुत है
कुचल कुचल के न फ़ुटपाथ को चलो इतनायहाँ पे रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं
लश्कर की आँख माल-ए-ग़नीमत पे है लगीसालार-ए-फ़ौज और किसी इम्तिहाँ में है
Down the way where the nights are gay and the sun shines daily in the mountain top, I took a trip on a sailing ship and when I reached Jamaica I made a stop But I am sad today I m on my way And won’t be back for many...
यूँ रात को होता है गुमाँ दिल की सदा परजैसे कोई दीवार से सर फोड़ रहा हो
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