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ग़ज़ल
फ़क़ीह-ए-शहर को समझो कि हम पकड़े गए नाहक़
शराबें सब उसी की थीं बस इक पैमाना मेरा था
अर्श सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
फ़क़ीह-ओ-शैख़ के ज़ेहनों में बुत होंगे ख़ुदाओं के
मैं इंसाँ हूँ मुझे तो सिर्फ़ इंसाँ याद आते हैं


