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नज़्म
आदमी-नामा
टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी
अब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुए
नज़ीर अकबराबादी
शेर
छेड़ती हैं कभी लब को कभी रुख़्सारों को
तुम ने ज़ुल्फ़ों को बहुत सर पे चढ़ा रक्खा है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
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नज़्म
रिश्वत
आप को मालूम भी है चल रही है क्या हवा
सिर्फ़ इक टाई की क़ीमत घोंट देती है गला
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
लगा के लासे पे ले के आया हूँ शैख़ साहब को मय-कदे तक
अगर ये दो घोंट आज पी लें मिलेगा मुझ को सवाब आधा
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
हास्य
पहले पहले शौहर को हर मौसम भीगा लगता है
यूँ समझो बिल्ली के भागों टूटा छीका लगता है







