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नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
दिन को भी यहाँ शब की सियाही का समाँ है
कहते हैं ये आराम-गह-ए-नूर-जहाँ है
तिलोकचंद महरूम
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ग़ज़ल
घट घाट अंधेरा है कैसे बाँधोगे कहाँ नय्या अपनी
आवाज़ किसे दोगे 'क़ैसी' चौ-धाम यहाँ सन्नाटा है
अज़ीज़ क़ैसी
शेर
वो बज़्म में हैं रोते हैं उश्शाक़ चौ तरफ़
पानी है गिर्द-ए-अंजुमन और अंजुमन में आग
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
मुहिउद्दीन गुल्फ़ाम
ग़ज़ल
लगाई आग उन के हुस्न-ए-आलम-सोज़ ने हर-सू
जलाने चौ-लखा बैठे हैं यूँ कोरे सकोरों में
आशिक़ अकबराबादी
ग़ज़ल
ईरानी ग़ालीचे के चौ-गर्द नशिस्तें क़ाएम हों
काफ़ूरी शम्ओं' से रौशन पैहम अहल-ए-हस्त रहें
अहमद जहाँगीर
ग़ज़ल
ज़ुल्फ़ है पस्त जो गेसू से तो ये काकुल से
चौ-गुने मर्तबा में इस से है तुर्रा ऊँचा
किशन कुमार वक़ार
ग़ज़ल
एक गुहर आँसू का न छोड़ा दिल की जोत जगाने को
याद किसी की ख़ाली कर गई रातों रात ख़ज़ाने को










