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पंडित जवाहर नाथ साक़ी

ग़ज़ल 37

शेर 26

फ़लक पे चाँद सितारे निकलने हैं हर शब

सितम यही है निकलता नहीं हमारा चाँद

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क़ालिब को अपने छोड़ के मक़्लूब हो गए

क्या और कोई क़ल्ब है इस इंक़लाब में

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नहीं खुलता सबब तबस्सुम का

आज क्या कोई बोसा देंगे आप

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जान-ओ-दिल था नज़्र तेरी कर चुका

तेरे आशिक़ की यही औक़ात है

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वो माह जल्वा दिखा कर हमें हुआ रू-पोश

ये आरज़ू है कि निकले कहीं दोबारा चाँद

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रुबाई 7

पुस्तकें 1

कुल्लियात-ए-साक़ी

 

1926