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नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
नाख़ुन किसी निगार का चाँदी के तार पर
मिज़राब-ए-अक्स-ए-क़ौस रग-ए-आबशार पर
जोश मलीहाबादी
नज़्म
हिण्डोला
यही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़ह
यहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूस
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
साबिर ज़फ़र
ग़ज़ल
रूहुल-क़ुदुस की तुझ को क़सम और मसीह की
मरियम के तुझ को इफ़्फ़त-ए-दामान की क़सम
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
यादें
ख़्वाब थे इक दिन औज-ए-ज़मीं से काहकशाँ को छू लेंगे
खेलेंगे गुल-रंग शफ़क़ से क़ौस-ए-क़ुज़ह में झूलेंगे
अख़्तरुल ईमान
हास्य
क़ौस-ए-क़ुज़ह चूल्हे में जाए काली घटा को आग लगे
क्या हम देख नहीं सकते हैं आप हमें दिखलाएँगे
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
वही नर्म लहजा
जैसे क़ौस-ए-क़ुज़ह ने कहीं पास ही अपनी पाज़ेब छनकाई है
हँसी को वो रिम-झिम
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
फ़रीहा नक़वी
नज़्म
नादारों की ईद
ख़ूँ चूस रहा है पौदों का इक फूल जो ख़ंदाँ होता है
पामाल बना कर सब्ज़ों को इक सर्व खरामा होता है
नुशूर वाहिदी
उद्धरण
अंग्रेज़ी फिल्मों में लोग यूँ प्यार करते हैं जैसे तुख़्मी आम चूस रहे हैं।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
भूली नहीं वो क़ौस-ए-क़ुज़ह की सी सूरतें
'साग़र' तुम्हें तो मस्त धियानों ने ले लिया
साग़र सिद्दीक़ी
नज़्म
सरमाया-दारी
ये अपने हाथ में तहज़ीब का फ़ानूस लेती है
मगर मज़दूर के तन से लहू तक चूस लेती है




