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नज़्म
ऑनलाइन आशिक़
दिल का पैग़ाम जब ईमेल से मिल जाता है
मेल हर चौक पे फ़ीमेल से मिल जाता है
खालिद इरफ़ान
शेर
तुझ को देखा न तिरे नाज़-ओ-अदा को देखा
तेरी हर तर्ज़ में इक शान-ए-ख़ुदा को देखा
मिर्ज़ा मायल देहलवी
नज़्म
नशात-ए-उमीद
अज़्म को जब देती है तू मेल जस्त
गुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्त
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं
ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत
क़ैसर शमीम
ग़ज़ल
ये जो मेल-जोल की बात है ये जो मज्लिसी सी हयात है
मुझे इस से कोई ग़रज़ नहीं मुझे दोस्ती की तलाश है
अमजद इस्लाम अमजद
ग़ज़ल
न होवे जब तलक इंसाँ को दिल से मेल-ए-यक-जानिब
'ज़फ़र' लोगों के दिखलाने को यकसूई से क्या हासिल


