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नज़्म
शब-बरात
और चाहो तुम हमारा ये हत-फूल छोड़ लो
हो जाए जिस के छुटते ही फुलवारी शब-बरात
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
आज और कल
बेकसी गर्म निगाहों को झुलस देती है
दिल किसी शोला-ए-ज़रताब से फुक जाते हैं
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
बद-तर ख़िज़ाँ से है हमें इस बाग़ की बहार
बोई निफ़ाक़ फूल में ही ज़हर फल में है
असद अली ख़ान क़लक़
कुल्लियात
इश्क़ की सोज़िश ने दिल में कुछ न छोड़ा क्या कहें
लग उठी ये आग नागाही कि घर सब फुक गया
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
अहमद फ़राज़
शेर
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
अहमद फ़राज़
नज़्म
शिकवा
थी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीम
फूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीम




