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नज़्म
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तू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाब
रह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराब
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
मर्ग-ए-'जिगर' पे क्यूँ तिरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानेहा सही मगर इतना अहम नहीं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में
मुझे ख़बर थी कि तेरे आँचल में
दर्द की रेत छानता हूँ
अहमद फ़राज़
नज़्म
ए'तिराफ़
दश्त-ए-पुर-ख़ार को फ़िरदौस-ए-जवाँ जाना था
रेग को सिलसिला-ए-आब-ए-रवाँ जाना था





