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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
कश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू है
अस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आवारा
जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी तोड़ दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
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विषय
आसरा
आसरा शायरी
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नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
इश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवा
और ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नाम
अल्लामा इक़बाल
शेर
आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फ़िराक़' को देखा है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
ऐतबार साजिद
नज़्म
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
फ़नकार
आज दुक्कान पे नीलाम उठेगा उन का
तू ने जिन गीतों पे रखी थी मोहब्बत की असास





