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ग़ज़ल
दम आया नाक में फ़रियादियों के शोर ओ ग़ौग़ा से
क़यामत में अबस क्यूँ खींच लाया इंतिशार अपना
शाद अज़ीमाबादी
नज़्म
एक शहर-आशोब का आग़ाज़
घर रहिए तो वीरानी-ए-दिल खाने को आवे
रह चलिए तो हर गाम पे ग़ौग़ा-ए-सगाँ है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जबीन-ए-पुर-शिकन ख़ासान-ए-आलम की नहीं भाती
मगर ये भी है ग़ोग़ा-ए-आवाम अच्छा नहीं लगता
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
नूह नारवी
नज़्म
तिफ़्लाँ की तो कुछ तक़्सीर न थी
जब निकले कू-ए-मलामत में
इक ग़ौग़ा तो हम ने भी सुना
फ़हमीदा रियाज़
ग़ज़ल
क़ल्ब पर गिरती तड़प कर फिर वही बर्क़-ए-जमाल
हर बुन-ए-मू में वही आशोब ओ ग़ौग़ा देखते
असग़र गोंडवी
ग़ज़ल
ग़ौग़ा है शर्क़ ओ ग़र्ब ओ जुनूब ओ शुमाल में
फ़ित्ने जगा गई तिरी रफ़्तार हर तरफ़












