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नज़्म
रक़ीब से!
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आगे उस मुतकब्बिर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद ख़ुदा को वो मग़रूर-ए-ख़ुद-आरा जाने है








