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नज़्म
किसी को उदास देख कर
तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
नजात जिन से मैं इक लहज़ा पा नहीं सकता
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
इक लहज़ा बहे आँसू इक लहज़ा हँसी आई
सीखे हैं नए दिल ने अंदाज़-ए-शकेबाई
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
रंग है दिल का मिरे
कोई भीगा हुआ दामन कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
ये लम्हा लम्हा ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश का हासिल है
कि लहज़ा लहज़ा अपने आप ही में मर रहा हूँ मैं
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
नज़्म
जुगनू
वो कुछ नहीं है अब इक जुम्बिश-ए-ख़फ़ी के सिवा
ख़ुद अपनी कैफ़ियत-ए-नील-गूँ में हर लहज़ा
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
नज़्र-ए-मौलाना हसरत-मोहानी
शब बीत गई है तो गुज़र जाएगा दिन भी
हर लहज़ा जो गुज़री वो हिकायत न करेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हाल-ओ-मक़ाम
अहवाल-ओ-मक़ामात पे मौक़ूफ़ है सब कुछ
हर लहज़ा है सालिक का ज़माँ और मकाँ और