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ग़ज़ल
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
आवारा
बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ
उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
उर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
उर्दू के जनाज़े की ये सज-धज हो निराली
सफ़-बस्ता हों मरहूमा के सब वारिस-ओ-वाली
रईस अमरोहवी
नज़्म
तुम नहीं आए थे जब
शब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़-ए-मुलाक़ात का रंग
रोज़ लाएगी सबा कू-ए-सबाहत से पयाम
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है
अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
हास्य
ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ में वो सज-धज कि बलाएँ भी मुरीद
क़दर-ए-रअना में वो चम-ख़म कि क़यामत भी शहीद
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
जवाहर-लाल नेहरू
मौत और ज़ीस्त के संगम पे परेशाँ क्यूँ हो
उस का बख़्शा हुआ सह-रंग-ए-अलम ले के चलो
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हिण्डोला
ज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगम
ये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुई














