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ग़ज़ल
दो अश्क जाने किस लिए पलकों पे आ कर टिक गए
अल्ताफ़ की बारिश तिरी इकराम का दरिया तिरा
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है
वसीम बरेलवी
नज़्म
मुझे अपने जीने का हक़ चाहिए
मुझे अपने जीने का हक़ चाहिए
ज़मीं जिस पे मेरे क़दम टिक सकें
अमजद इस्लाम अमजद
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ग़ज़ल
शमीम अब्बास
नज़्म
शायद मिट्टी मुझे फिर पुकारे
चादर और आवाज़ को तह कर के रख दो
लौटने तक मेरी आवाज़ धरती पे गूँजती रहे
सारा शगुफ़्ता
नज़्म
नया साल
फिर वही टिक-टिक घड़ी की और पुराने फ़ासले
फिर वही ऑफ़िस की जल्दी फिर वही शिकवे गिले
शहरोज़ ख़ावर
नज़्म
हमारे कमरे में पत्तियों की महक ने
और इस पे अब ये घड़ी की टिक-टिक ने,
दिल उदासी से भर दिया है


