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टेक चंद बहार

1687 - 1766 | दिल्ली, भारत

शेर 5

हमें वाइ'ज़ डराता क्यूँ है दोज़ख़ के अज़ाबों से

मआसी गो हमारे बेश हों कुछ मग़फ़िरत कम है

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वही इक आसमाँ है जिस को हम तुम तार कहते हैं

कभी तस्बीह कहते हैं कभी ज़ुन्नार कहते हैं

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कहते हैं अंदलीब-ए-गिरफ़्तार मुझ को देख

उम्मीद जीवने की नहीं इस बहार में

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