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ग़ज़ल
कुंज-ए-उज़्लत में मिसाल-ए-आसिया हूँ गोशा-गीर
रिज़्क़ पहुँचाता है घर बैठे ख़ुदा मेरे लिए
मीर अनीस
ग़ज़ल
ये कह के फिरती है दिन रात आसिया-ए-फ़लक
मिले तो ख़िर्मन-ए-मह दे के लूँ मैं दाना-ए-इश्क़
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
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ग़ज़ल
सख़्त-जानी मेरी और ज़ालिम तिरे संगीं-दिली
आह मिस्ल-ए-आसिया ये संग ऊपर संग है
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
मैं तो पहले ही से नज़्र-ए-आसिया-ए-चर्ख़ था
इश्क़ ने रख दी मिरे सीने पे इक सिल और भी
हरभजन सिंह सोढ़ी बिस्मिल
ग़ज़ल
मुसीबत में रहा करते हैं जो भी दाना दुनिया में
उन्हीं को पीस्ता है चर्ख़-ए-ज़ालिम आसिया हो कर








