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ग़ज़ल
वो आवेंगे मिरे घर वा'दा कैसा देखना 'ग़ालिब'
नए फ़ित्नों में अब चर्ख़-ए-कुहन की आज़माइश है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे
जो होगी उम्र भर की राह तो दम भर में आवेंगे
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
आवेंगे फिर भी 'मुसहफ़ी' देखने मेरे घर कभी
अटका है अब तो उन से जी गरचे वो मुँह छुपा गए
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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शेर
गर ये आँसू हैं तो लाख आवेंगे दरिया जोश में
गर ये आँखें हैं तो दिखलावेंगी तूफ़ाँ सैकड़ों
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
फिर न आवेंगे कभी ऐसी ही गर आज़ुर्दा हो
बस चले हम ख़ुश रहो काहे को झुँजलाते हो तुम
मीर मोहम्मदी बेदार
कुल्लियात
रंग मोहब्बत के हैं कितने कोई तुम्हें ख़ुश आवेगा
ख़ून करोगे या दिल को या दाग़ जिगर पे जलाओगे
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
कूचे में तेरे ज़ालिम अज़-बहर-ए-दाद-ख़्वाही
ये ज़ुल्म है तो लाखों आवेंगे घाट वाले
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
तुम जो कहते हो कि आवेंगे तिरे हाँ कल तक
कौन जीता है जुदाई में मिरी जाँ कल तक

