मजबूरी शायरी

मजबूरी ज़िंदगी में तसलसुल के साथ पेश आने वाली एक सूरत-ए-हाल है जिस में इंसान की जो थोड़ी बहोत ख़ुद-मुख़्तारियत है वो भी ख़त्म हो जाती और इंसान पूरी तरह से मजबूर हो जाता है और यहीं से वो शायरी पैदा होती है जिस में बाज़ मर्तबा एहतिजाज भी होता है और बाज़ मर्तबा हालात के मुक़ाबले में सिपर अंदाज़ होने की कैफ़ियत भी। हम इस तरह के शेरों का एक छोटा सा इंतिख़ाब पेश कर रहे हैं।

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

she would have had compulsions surely

faithless without cause no one can be

she would have had compulsions surely

faithless without cause no one can be

बशीर बद्र

तेरी मजबूरियाँ दुरुस्त मगर

तू ने वादा किया था याद तो कर

नासिर काज़मी

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह

तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है

कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते

अज्ञात

ज़िंदगी है अपने क़ब्ज़े में अपने बस में मौत

आदमी मजबूर है और किस क़दर मजबूर है

अहमद आमेठवी

इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी

कि हम ने आह तो की उन से आह भी हुई

जिगर मुरादाबादी

हाए रे मजबूरियाँ महरूमियाँ नाकामियाँ

इश्क़ आख़िर इश्क़ है तुम क्या करो हम क्या करें

जिगर मुरादाबादी

मिरी मजबूरियाँ क्या पूछते हो

कि जीने के लिए मजबूर हूँ मैं

हफ़ीज़ जालंधरी

क्या मस्लहत-शनास था वो आदमी 'क़तील'

मजबूरियों का जिस ने वफ़ा नाम रख दिया

क़तील शिफ़ाई

हाए 'सीमाब' उस की मजबूरी

जिस ने की हो शबाब में तौबा

सीमाब अकबराबादी

ज़िंदगी जब्र है और जब्र के आसार नहीं

हाए इस क़ैद को ज़ंजीर भी दरकार नहीं

फ़ानी बदायुनी

वहशतें इश्क़ और मजबूरी

क्या किसी ख़ास इम्तिहान में हूँ

ख़ुर्शीद रब्बानी

एहसान ज़िंदगी पे किए जा रहे हैं हम

मन तो नहीं है फिर भी जिए जा रहे हैं हम

इम्तियाज़ ख़ान

जो कुछ पड़ती है सर पर सब उठाता है मोहब्बत में

जहाँ दिल गया फिर आदमी मजबूर होता है

लाला माधव राम जौहर

मैं चाहता हूँ उसे और चाहने के सिवा

मिरे लिए तो कोई और रास्ता भी नहीं

सऊद उस्मानी

मैं ने सामान-ए-सफ़र बाँध के फिर खोल दिया

एक तस्वीर ने देखा मुझे अलमारी से

अज्ञात

न-जाने कौन सी मजबूरियाँ हैं जिन के लिए

ख़ुद अपनी ज़ात से इंकार करना पड़ता है

अतहर नासिक