ग़ज़ल 23

शेर 28

हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को

कितनी दूर से आई है ये रेत से हाथ मिलाने को

पक्का रस्ता कच्ची सड़क और फिर पगडंडी

जैसे कोई चलते चलते थक जाता है

जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है

इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइए

मुझे ये सारे मसीहा अज़ीज़ हैं लेकिन

ये कह रहे हैं कि मैं तुम से फ़ासला रक्खूँ

हर एक जिस्म में मौजूद हश्त-पा की तरह

वबा का ख़ौफ़ है ख़ुद भी किसी वबा की तरह

पुस्तकें 2

Barish

 

 

Qaus

 

1997

 

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