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ग़ज़ल
उक़्दा-ए-इश्क़ अजब उक़्दा-ए-मोहमल है 'फ़िराक़'
कभी ला-हल कभी मुश्किल कभी आसाँ हो जाए
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ब-फैज़-ए-बे-दिली नौमीदी-ए-जावेद आसाँ है
कुशायिश को हमारा उक़्दा-ए-मुश्किल-पसंद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
नाला-ए-फ़िराक़
खोल देगा दश्त-ए-वहशत उक़्दा-ए-तक़दीर को
तोड़ कर पहुँचूँगा मैं पंजाब की ज़ंजीर को
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जान देने में जो लज़्ज़त है बचाने में कहाँ
दिल किसी से जो बंधे उक़्दा-ए-ग़म खुलता है
वहीद अख़्तर
ग़ज़ल
दर्द का दर्द से रिश्ता है चलो ऐ 'मजरूह'
आज यारों से ये इक उक़्दा-ए-आसाँ तो खुला
मजरूह सुल्तानपुरी
नज़्म
गुल-ए-रंगीं
तू शनासा-ए-ख़राश-ए-उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं
ऐ गुल-ए-रंगीं तिरे पहलू में शायद दिल नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
उक़्दा-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-ज़ुल्फ़ का खुलना मा'लूम
राज़-ए-अलम से है ये सिलसिला-ए-राज़ जुदा
