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ग़ज़ल
क्यूँ ये मेहर-अंगेज़ तबस्सुम मद्द-ए-नज़र जब कुछ भी नहीं
हाए कोई अंजान अगर इस धोके में आ जाए तो
अंदलीब शादानी
नज़्म
मता-ए-ग़ैर
दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं नज़रें
देखते देखते अंजान भी हो जाती हैं
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
हिरास
मैं तिरे शहर में अंजान हूँ परदेसी हूँ
तेरे अल्ताफ़ का मफ़्हूम समझ लूँ तो कहूँ









