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ग़ज़ल
जो लोग नहीं वाक़िफ़-ए-असरार-ए-मोहब्बत
क्या उन की निगाहों में हो मे’यार-ए-मोहब्बत
शरीफ़ुद्दीन नाशिर
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ग़ज़ल
हर एक पे खुलते नहीं असरार-ए-मोहब्बत
हर शख़्स को दिल जैसा ख़ज़ाना नहीं देते
मोहम्मद मुस्तहसन जामी
हास्य
नाम है 'असरार' जिस का उस की हालत क्या कहूँ
मुर्ग़-ओ-माही खा रहा है और परेशानी में है
असरार जामई
ग़ज़ल
हिज्र में खुलते हैं असरार-ए-मोहब्बत क्या क्या
ग़म में ये मो'जिज़ा-ए-हुस्न-ए-मसीहा ही सही