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नज़्म
तुम हँसते क्यूँ हो
मेरी बग़लों के बालों से उलझती हुई
मेरे जिस्म के कोने खुदरों में
अज़रा अब्बास
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ग़ज़ल
इक तरफ़ मोर मुंडेरों पे करें क्या क्या शोर
इक तरफ़ अब्र में बगलों की क़तार आए नज़र
जुरअत क़लंदर बख़्श
नज़्म
तूफ़ान मेल
ये सुनते ही बग़लों में बस्ते लिए
और इक सफ़ में सीधे खड़े हो गए
अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी
नज़्म
अस्फ़ल-उस-साफ़िलीन
अपनी अपनी बग़लों में दबाए खड़े हैं
और हर बार इन बुतों को सज्दा करते हुए
नाहीद अख़्तर बलूच
ग़ज़ल
एक दिन हो जाएगा रौशन सियह-कारी का हाल
दोनों बग़लों में जरीदे हैं कि जोड़ा साँप का
इमदाद अली बहर
नज़्म
कत्बों के मतरूक अल्फ़ाज़ कहाँ जाएँ
बहरी क़ज़्ज़ाक़ों के दिल में गहरे नीले पानी का तो ख़ौफ़ नहीं
लेकिन वो भूके बगलों से डरते हैं
सहर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
साथ रंडी के चले मिर्ज़ा जी किस शान के साथ
दहना बग़लों में दबाए हुए बायाँ सर पर


