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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
फ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं
क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़िंदगी से डरते हो
फिर भी ये समझते हो हेच आरज़ू-मंदी
ये शब-ए-ज़बाँ-बंदी है रह-ए-ख़ुदा-वंदी
नून मीम राशिद
नज़्म
फ़र्ज़ करो
शाइ'र भी जो मीठी बानी बोल के मन को हरते हैं
बंजारे जो ऊँचे दामों जी के सौदे करते हैं
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे
पागल कुछ तो सोच ये तू ने कैसी शक्ल बनाई है
जौन एलिया
शेर
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी
ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में
मगर हर इक बार तुझ को छू कर
ये रेत रंग-ए-हिना बनी है
अहमद फ़राज़
शेर
वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्न-ए-आख़िर था
कि चुप सी लग गई दोनों को बात करते हुए




