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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
है आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तर
क़यामत सानेहा मतलब क़यामत फ़ाजिआ परवर
जौन एलिया
नज़्म
तराना-ए-हिन्दी
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस वक़्त तो यूँ लगता है
इक बैर न इक मेहर न इक रब्त न रिश्ता
तेरा कोई अपना, न पराया कोई मेरा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है
अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
नया शिवाला
अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
पीर-ए-मुग़ाँ से हम को कोई बैर तो नहीं
थोड़ा सा इख़्तिलाफ़ है मर्द-ए-ख़ुदा के साथ
अब्दुल हमीद अदम
फ़िल्मी गीत
आज मैं ग़ैर हूँ कुछ दिन हुए मैं ग़ैर न था
मेरी चाहत मिरी उल्फ़त से तुझे बैर न था
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
हिण्डोला
कहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन में
मिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीह













