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अप्रचलित ग़ज़लें
ضمان جادہ رویاندن ہے خط جام مے نوشاں
دگر نہ منزل حیرت سے کیا واقف ہیں مدہوشاں
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
साग़र-ए-सिफ़ालीं को जाम-ए-जम बनाया है
फैल कर मिरे दिल ने ''मैं'' को ''हम'' बनाया है
परवेज़ शाहिदी
ग़ज़ल
कुछ अपने काम नहीं आवे जाम-ए-जम की किताब
किफ़ायत अपने को बस एक अपने ग़म की किताब
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ग़ज़ल
पता रक़ीब का दे जाम-ए-जम तो क्या होगा
वो फिर उठाएँगे झूटी क़सम तो क्या होगा




