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नज़्म
हम लोग
ग़ायत-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ सूरत-ए-आगाज़-ओ-मआल
वही बे-सूद-ए-तजस्सुस वही बेकार सवाल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
ज़ुल्मत-ए-अना
ज़ेहन पर छाई है बे-सूद ख़यालों की घटा
फिक्र-ओ-एहसास का हर गोशा है महरूम-ए-ज़िया
अख़तर बस्तवी
ग़ज़ल
किसानों को मयस्सर जब नहीं दो वक़्त की रोटी
तो ऐसे खेत को बे-सूद-ओ-बंजर लिख दिया जाए
मुर्ली धर शर्मा तालिब
नज़्म
कुछ अगर है तो मिले
फैल के साहिल-ए-पायाब को ग़ारत कर दे
मर्क़द-ए-हीला-ए-बे-सूद मिटे
किश्वर नाहीद
ग़ज़ल
बे-सूद है ये जोश-ए-गिर्या ऐ शम्अ' सहर हो जाने तक
छींटा तिरे अश्क-ए-पैहम का पहुँचा न कभी परवाने तक
दिल शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
ज़ोर-ए-अमवाज-ए-तलातुम से है दरिया दरिया
हर्फ़-ए-बे-सूद कि दरिया में गुहर है कि नहीं
