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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
घर तो बीवी से है बीवी जो नहीं घर भी नहीं
ये डबल बेड ये तकिया नहीं चादर भी नहीं
नश्तर अमरोहवी
ग़ज़ल
न कुछ चारा चला लाचार चारों हार कर बैठे
बिचारे बेद ने प्यारे बहुत तुम को बेचारा है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
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ग़ज़ल
बेद-ए-मजनूँ को हो जब देखते ऐ अहल-ए-नज़र
किसी मजनूँ को भी आशुफ़्ता-बसर देखते हो
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
नज़्म
तर्क-ए-मोहब्बत के बा'द
जिस की राहों पे भटकते हुए जग बीते हैं
फिर उसी दश्त को बद-बख़्त सुधारे कैसे
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
नहीं ये बेद-ए-मजनूँ गर्दिश-ए-गरदून-ए-गर्दां ने
बनाया है शजर क्या जानिए किस मू परेशाँ को
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
कुश्ता-ए-ज़ुल्फ़ के मरक़द पे तू ऐ लैला-वश
बेद-ए-मजनूँ ही लगा ता-कि पता याद रहे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
क़द-ए-मजनूँ कोई पहले से छड़ी बेद की है
जब ज़रा झुकता है क़द पाँव से जा लगता है











