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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
किस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी है
हम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हक़ीक़त से ख़याल अच्छा है बेदारी से ख़्वाब अच्छा
तसव्वुर में वो कैसा सामना होने से पहले था
अनवर शऊर
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
सल्तनत अक़्वाम-ए-ग़ालिब की है इक जादूगरी
ख़्वाब से बे-दार होता है ज़रा महकूम अगर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नौ-जवान ख़ातून से
तिरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा है
अगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
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विषय
बेदार
बेदार शायरी
विषय
बेबसी
बेबसी शायरी
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bedaarii
बेदारीبیداری
जागरण, सोते से उठाना, नींद से जागना, जाग्रति, जागरण, समय के अनुसार काम करना, होशियार होना, सावधान होना
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नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
मौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है ये
कितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है ये
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
बेदारी के बिस्तर पर मैं उन के ख़्वाब सजाता हूँ
नींद भी जिन की टाट के ऊपर ख़्वाबों से नादार गिरी
जौन एलिया
ग़ज़ल
तुम से दूरी, ये मजबूरी, ज़ख़्म-ए-कारी, बेदारी,
तन्हा रातें, सपने क़ातें, ख़ुद से बातें, मेरी ख़ू
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
रात हो दिन हो कि ग़फ़लत हो कि बेदारी हो
उस को देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत
कृष्ण बिहारी नूर
ग़ज़ल
बेदारी आसान नहीं है आँखें खुलते ही 'अमजद'
क़दम क़दम हम सपनों के जुर्माने भरने लगते हैं







