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नज़्म
क़हक़हे
यूनुस जो फेंकते हैं कभी मुझ पे बेलचा
मैं बन के ख़ाकसार लगाता हूँ क़हक़हे
राजा मेहदी अली ख़ाँ
ग़ज़ल
निगाह-ए-शौक़ क्या ठहरी वो गोया बेलचा ठहरी
मकान-ए-यार की दीवार में जिस से कि रौज़न हो
ज़रीफ़ लखनवी
ग़ज़ल
कुछ भी हो वो तिरा ग़म-ख़्वार नहीं है 'रज़्मी'
बेलचा छीन के जो हाथ में कासा रख दे
मुज़फ़्फ़र रज़्मी
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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो
बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्याद बचा
ताइर उड़ते हवा में सारे अपने असारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
तू बचा बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझ से बचा कर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझ को
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले

