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ग़ज़ल
ये लाली और बिंदी 'रीत' क्यों भाते नहीं तुम को
इसी श्रंगार से तो जिस्म औरत का सँवरता है
ऋतु सिंह राजपूत रीत
ग़ज़ल
अब तो मुझ को रंग ही भाते नहीं तब तो तेरी
ज़ुल्फ़ के साए धनक के रंगों से बढ़ कर लगे











